संसाधनों के बावजूद झारखंड में समस्याओं का बढ़ता आकार

संसाधनों के बावजूद झारखंड में समस्याओं का बढ़ता आकार

झारखंड का नाम सुनते ही ज़हन में जादुई पहाड़ियां, झरने, घाटियां और विविध आदिवासी संस्कृतियों का ख़्याल आता है। प्रकृति की गोद में बसा यह राज्य अपार संसाधनों और भविष्य की संभावनाओं से समृद्ध है। जंगल, खनिज, नदियां जैसे प्राकृतिक संसाधन झारखंड की शान है।
लेकिन इतने सारे संसाधनों की मौजूदगी के बाद भी हमारा झारखंड सभी राज्यों से विकास के मामले में बहुत ही पीछे हैं। यहां की जनता बहुत ही गरीबी में अपना जीवन गुजार रही है। तो ऐसा क्या है जो 19 वर्ष के नौजवान झारखंड को आगे बढ़ने से रोक रहा है? क्यों इतने संसाधनों के मौजूदगी होते हुए भी इसका लाभ नहीं मिल रहा है? इसके कारण कई हैं। झारखंड में भारत की कुल खनिज संपदा का 40 फ़ीसदी हिस्सा है, लेकिन मूल्य के मामले में देखें तो यह राज्य देश के कुल खनिज उत्पादन मे केवल 10 फ़ीसदी हिस्सेदारी रखता है।

अगर शिक्षा की बात करें तो भी राज्य की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है। गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी राज्य को अंदर से खोखला कर रहे हैं। राज्य की सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह यहां की राजनैतिक अस्थिरता है ।

अपने 19 वर्ष के सफर में झारखंड में किसी भी राज्य की तुलना में सबसे अधिक मुख्यमंत्रियों को देखा। राज्य में अब तक सात अलग-अलग मुख्यमंत्री रह चुके हैं और यही परेशानी की वजह भी है। यहां की जनता नेताओं को नहीं समझ पा रही है और ना ही नेता जनता की जरूरतों और मांगों को समझ पा रहे हैं।
झारखंड को विकास की ओर ले जाने के लिए बहुत जरूरी है कि राज्य का नेता ऐसा हो जो यहां के लोगों को समझता है और उनकी तकलीफों को भी जानता हो।

झारखंड की नीव पड़ते समय यहां के प्रथम मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल जी ने यहीं सपना देखा था कि हमारा राज्य सबसे बेहतर हो। मात्र 28 महीने में उन्होंने यहां के लोगों के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए लोगों में विकास की भूख जगाने का प्रयास किया।

अब राज्य की स्थिति को सुधारना हमारे हाथ में है। बाबूलाल मरांडी ने जो सपना19वर्ष पहले देखा था हम सबको मिलकर उसे साकार करना है और झारखंड को विकास की ओर अग्रसर करना है।

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